मर्दों को खुश करने में औरतों की जान भले ही क्यों न चली जाए

लेखक: मृदुलिका

मैं छुट्टी पर अपने शहर में थी। तभी एक दोस्त ने आनन-फानन घर बुलाया। पहुंची तो पता चला कि लड़के वाले उसे ‘देखने’ आ रहे थे। दोस्त करीबी थी, लिहाजा अपना बगावती परचम समेट मैं मदद को तैयार होने लगी, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ। दरअसल दोस्त परेशान थी कि उसके शरीर में उतने उभार नहीं, जितने किसी लड़की में होने चाहिए! लड़की में कहां, कितने इंच-सेंटीमीटर के उभार हों कि वह लड़की कहलाए? 

सवाल पूछते ही जवाब में एक लिस्ट थमा दी गई। कितनी बार उसे इसी बात पर रिजेक्ट किया गया कि वह दुबली-पतली है। दिखाई-तिखाई को पहुंचे लड़केवालों को ऐसे जवाब के बाद भी भगाया नहीं जाता, बल्कि दोस्त की मां-चाचियां मासूमियत से उन्हें बहलातीं- ‘शादी के बाद तो बदन भर ही जाएगा। बाकी तो हमारी लड़की खरा सोना है। लीजिए, थोड़ा मीठा खाइए, सब इसी ने बनाया है’।

सालों पुराने इस वाकये का जिक्र इसलिए कि लड़की का ‘सपाट सीना’ अब भी चर्चा में है। हाल में तंजानिया की राष्ट्रपति सामिया सुलुहू हसन ने कह दिया कि सपाट छाती वाली लड़कियां शादी के लिए सही नहीं। ये बात उन्होंने महिला फुटबॉलर्स पर कमेंट करते हुए कही थी। इसके बाद सोशल मीडिया पर हमेशा की तरह कमेंट-ट्रोलिंग का खेल चलने लगा। तंजानियन राष्ट्रपति का बयान हवा में भभूत की तरह नहीं जन्मा। इसकी जड़ें भूतिया बरगद से भी पुरानी और गहरी हैं।

अमेरिकी मनोवैज्ञानिक क्रिस्टोफर रायन ने अपनी किताब सेक्स एट डॉन (Sex at Dawn) में लिखा है कि आदिम युग में भी पुरुषों को वही महिलाएं भाती थीं, जिनकी छातियां भरी हुई हों। वे इसे यौन ताकत और ज्यादा से ज्यादा संतानें पैदा करने की क्षमता के तौर पर देखते थे। कई धार्मिक किताबों में भी स्त्री चरित्र का नखशिख बताते हुए उसके स्तनों की तुलना भरे हुए फलों से की जा चुकी है।

औरतें अपने-अपने तरीके से शरीर के इस हिस्से को उभारने की कोशिश किया करतीं। जैसे भारत की ही बात करें तो यहां पर 12वीं से लेकर 16वीं सदी तक महिलाओं के शरीर के ऊपरी हिस्से को ढंकने के लिए खास कपड़े होते, जिन्हें कुचवस्त्र कहा जाता। ये ऐसे बंधते कि शरीर ज्यादा से ज्यादा आकर्षक दिखे।

एक पुरस्कार विजेता अभिनेत्री ने अपने स्तन प्रत्यारोपण को हटा दिया क्योंकि उसे लगा कि वे उसे मार रहे हैं।

यूरोप में कॉरसेट हुआ करते थे। ये इस तरह से डिजाइन होते जो पेट को एकदम सपाट रखें और छातियों को ऊपर की ओर ले जाएं। मछली की हड्डियों और पीतल-चांदी के तारों से बनी ये ड्रेस कई किलो की होती, और बुनावट ऐसी कि सांस लेने के लिए रात का इंतजार करना पड़े। आगे चलकर कॉरसेट की डिजाइन और पेचीदा हुई। इसे अंग्रेजी के S के शेप में रखा गया था ताकि ब्रेस्ट ऊपर की ओर जाएं और निचला हिस्सा बाहर की तरफ।

ये कॉरसेट एक तरह का खांचा था, जिसमें बेतरतीब औरत को घुसाकर एक सुडौल, कमनीय कामिनी बाहर निकाली जाती। सारा यूरोप, अमीर-गरीब मुरझाई देह औरत को कॉरसेट में डाल, नई स्त्री को निकालने लगा, जैसे जादूगर टोपी से कंचे की बजाए रंगीन फूल निकालता है। वक्त के साथ नई खोजें हुईं। कहीं बिजली बनी तो कहीं पहिए, लेकिन ब्रेस्ट को लेकर हमारा फितूर कम नहीं हुआ। हमने कई तरह की क्रीम, तेल बना डाले। यहां तक कि सक्शन मैथड भी बनाया ताकि उम्रदराज, थके उभारों को नया रूप दिया जा सके।

इसी दौर में सर्जरी होने लगी। शुरुआती सर्जरी विक्टोरियन काल में हुई, जिसमें शरीर में पैराफिन वैक्स भर दिया जाता था। सर्जरी कामयाब रही तो ऑपरेशन थिएटर से एक उभारदार औरत निकलती। वहीं ज्यादातर मामले असफल रहे और महिला मरीजों की मौत हो गई। कुछ सालों बाद ये सर्जरी तो बंद हुई लेकिन एक सस्ता और आसान तरीका मार्केट में आ चुका था। ये 1940 के दशक की बात है, जब घर-घर के तारों पर पैडेड ब्रा सूखने लगे।

उभारदार स्त्री-देह को लेकर हमारी खब्त रुकी, सिलिकॉन ब्रेस्ट इंप्लांट पर। साठ के दशक से शुरू हुई ये सर्जरी आज कॉस्मेटिक सर्जरी में दूसरे नंबर पर है। पहले नंबर पर है लाइपोसक्शन यानी शरीर से चर्बी हटाना। इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि परफेक्ट ब्रेस्ट पाना कितनी बड़ी ‘जरूरत’ बन चुका है। देश में हर साल लगभग 20 हजार ब्रेस्ट सर्जरी होती हैं। भारत इस मामले में विकसित देशों के बीच 7वें नंबर पर खड़ा है। इंटरनेशनल सोसायटी ऑफ एस्थेटिक प्लास्टिक सर्जरी (ISAPS) के मुताबिक साल 2010 में 51 हजार से ज्यादा भारतीय महिलाओं ने ये सर्जरी करवाई। ये संख्या हर साल बढ़ रही है।

ब्रेस्ट इनलार्जमेंट सर्जरी के कई बेहद गंभीर खतरे हैं। कई बार सिलिकॉन लीकेज से महिला की जान पर बन आती है। इंफेक्शन का डर रहता है। इसके साथ ही लाखों रुपए लगाने के बाद भी ‘मनमुताबिक रिजल्ट’ नहीं मिलता। तब क्या वजह है जो सपाट छाती को उभारदार बनाने के लिए औरतें जान की बाजी लगा रही हैं? जवाब आसान है- ताकि वे पुरुषों की नजर में कमनीय लग सकें। पुरुषों का स्त्री-देह के इस हिस्से से खास कनेक्शन है, ये बात साइंस भी कह रहा है।

जर्नल ऑफ सोशियो इकोनॉमिक्स के एक पेपर के मुताबिक पुरुषों को महिला शरीर का ऊपरी हिस्सा खासतौर पर आकर्षित करता है। लिहाजा, स्त्रियां अपने चहेते पुरुष की नजर में आकर्षक दिखने के लिए जान की भी परवाह नहीं कर रहीं।

अब लौटते हैं मेरी दोस्त पर। उसकी शादी हो चुकी है और जैसा कि उसके घर की महिलाओं ने वादा किया था, शादी के बाद अब उसके शरीर पर पर्याप्त उभार भी हैं, लेकिन नहीं है तो आजादी। वह काम करना चाहती थी, लेकिन घर पर है। वह घूमना चाहती थी, लेकिन मामला मंदिर की परिक्रमा तक रुक गया। उसे जानवरों से प्यार था, लेकिन अब हफ्ते के किसी दिन कुत्ते और किसी रोज कौवे को रोटी चुगाने तक ही वो प्यार रह गया। सालों पहले जिस आदर्श स्त्री-देह को वो खोज रही थी, वह शरीर उसे मिल चुका लेकिन उसकी अपनी पहचान खो देने की कीमत पर।

तो लड़कियों, थोड़ा सोचो। माई बॉडी, माई चॉइस- का नारा बुलंद करने भर से या फिर टैटू गुदवाने या कपड़ों को अस्त-व्यस्त कर देने-भर से हम आजाद नहीं होंगे। आजादी अपने शरीर और अपनी त्वचा के साथ सहज होने में है। आजादी इस खयाल में है कि भले किसी को मेरा रंग खटके, भले किसी को मैं मोटी-दुबली या बेतरतीब लगूं, मैं यही हूं- अपनी सोच और सपनों के साथ उजली।

Dr Rohit Bhaskar, Physio
Dr Rohit Bhaskar, Physio Dr. Rohit Bhaskar, Physio is Founder of Bhaskar Health and Physiotherapy and is also a consulting physiotherapist. He completed his Graduation in Physiotherapy from Uttar Pradesh University of Medical Sciences. His clinical interests are in Chest Physiotherapy, stroke rehab, parkinson’s and head injury rehab. Bhaskar Health is dedicated to readers, doctors, physiotherapists, nurses, paramedics, pharmacists and other healthcare professionals. Bhaskar Health audience is the reason I feel so passionate about this project, so thanks for reading and sharing Bhaskar Health.

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